लखनऊ, विधि संवाददाता। फायरिंग रेंज के लिए जमीन की आवश्यकता पर राज्य सरकार के अधिकारियों और सेना के बीच मतभेद का मामला हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच पहुंचा है। इस पर न्यायालय ने टिप्पणी की कि, यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा से संबंधित मामले में, संबंधित अधिकारियों द्वारा आपस में मामले को सुलझाने की बजाय, कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। न्यायालय ने मामले के हल के लिए रक्षा मंत्रालय व राज्य सरकार के अधिकारियों को बैठक करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवायी 21 दिसंबर को होगी।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने यह आदेश वर्ष 2011 में दाखिल जनहित याचिका व अन्य संबंधित याचिकाओं पर एक साथ सुनवायी करते हुए पारित किया। सुनवाई के दौरान सेना की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि लखनऊ स्थित सेंट्रल कमांड मुख्यालय और सेना के जवानों के लंबी दूरी की फायरिंग अभ्यास के लिए लगभग 2300 हेक्टेयर अर्थात करीब 23 वर्ग किलोमीटर जमीन की आवश्यकता है।गलतफहमी में दर्ज हो गई कार्यवृत्त में मांग
उन्होंने कहा कि मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक के कार्यवृत्त में 250 से 300 एकड़ जमीन की मांग दर्ज हो गई जो किसी गलतफ़हमी के कारण प्रतीत होती है। उन्होंने यह भी बताया कि इस संबंध में कार्यवृत्त में संशोधन के लिए आवेदन भी दिया गया है, जो अभीविचाराधीन है। उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया गया कि मुख्य सचिव की बैठक में ही, भारतीय सेना ने अपने द्वारा अपेक्षित क्षेत्र का संपूर्णचार्ट संबंधित विवरणों सहित प्रस्तुत कर दिया था, ऐसे में कार्यवृत्त में 250-300 एकड़ का माप गलत अंकित हुआ है। राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा उस पर भरोसा किया जा रहा है।
सेना की ओर से यह भी दलील
सेना की ओर से यह भी दलील दी गई कि पहले लगभग 20 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को फायरिंग रेंज के रूप में अधिसूचित किया गया था, लेकिन उस पर अतिक्रमण और निर्माण हो जाने के कारण वह उपयोग के योग्य नहीं रह गया। यह क्षेत्रसेना की अपनी जमीन पर फायरिंग अभ्यास के लिए बफर जोन के रूप में भी इस्तेमाल होता था, लेकिन अतिक्रमणके चलते अब ऐसा संभव नहीं है।
पहले कितनी जमीन की आवश्यता, यह तय हो
इस पर न्यायालय ने उपरोक्त टिप्पणी करते हुए कहा कि रक्षा मंत्रालय स्पष्ट रूप से तय करे कि सेना को कितनी जमीन की आवश्यकता है। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार लखनऊ के आसपास यथा संभव उपयुक्त जमीन की पहचान की प्रक्रिया शुरू करे। कोर्ट ने कहा कि रक्षा मंत्रालय द्वारा आवश्यकता स्पष्ट किए जाने के बाद मामला राज्य सरकार के उच्चतम स्तर पर रखा जाए और सेना तथाराज्य सरकार के अधिकारियों के बीच उच्चस्तरीय बैठक कर आगे की कार्रवाई की जाए।
सेना नहीं कर पा रही ट्रेनिंग
उल्लेखनीय है कि मामले में केंद्र सरकार की ओर से बाकायदा शपथ पत्र दाखिल कर कहा जा चुका है कि अर्जुनगंज फायरिंग रेंज में अतिक्रमण की वजह से सेना लंबी दूरी के हथियारों की ट्रेनिंग नहीं कर पा रही है। वहीं न्यायालय भी टिप्पणी कर चुकी है कि सेना के अधिकारियों द्वारा अवैध अतिक्रमण को रोकने के बार-बार अनुरोध के बावजूदराज्य सरकार व एलडीए के अधिकारी अपने आंख व कान बंद किए रहे, जिसका नतीजा यह हुआ कि अब सेना वहाँ लॉन्ग रेंज फायरिंग प्रैक्टिस नहीं कर सकती।

