जवाब: बीते हुए तीन साल उतार चढ़ाव से भरपूर रहे। बच्चों और उनके अभिभावकों के साथ इमोशनली जुड़ाव रहा, आगे भी रहेगा। जब नतीजे अच्छे आने लगे, रिकवरी की दरें बढ़ीं तो ख़ुशी के आंसू आंखों में आए। जब बच्चा रिकवर नहीं कर पाया तो उसके पेरेंट्स का चेहरा देख कर भी आंखों में आंसू आये।
ऐसे कई मजबूर पेरेंट्स हमारे पास आते हैं जिनके लिए हम कुछ कर नहीं पाते, जिसकी वजह होती है साधन-संसाधनों की कमी। आने वाले सालों के लिए हमारा पहला टारगेट यही है कि हम संसाधनों की कमियों को पूरा करें। साथ ही हमारा यह लक्ष्य है कि ऑटिज्म से जुड़ी हर एक जानकारी समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाई जाए, जिससे इस डिसऑर्डर से जुड़ी भ्रांतियों से लोग डरे नहीं, बल्कि इसका इलाज कराने लोग खुद आएं।
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हमारा यह भी लक्ष्य है कि लखनऊ के हर कोने में हम अपना सेंटर स्थापित कर सकें, जिससे अभिभावकों के ट्रैवलिंग टाइम को कम किया जा सके। साथ ही हम एक ऐसा स्कूल संचालित करने के प्रयासों में लगे हैं, जिसमें पढ़ाई के साथ-साथ को-करिकुलर एक्टिविटी पर ज्यादा से ज्यादा फोकस किया जाए।

उनकी खूबियों को तराशा जाए। स्पेशल बच्चों के लिए हम स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम भी शुरू करने जा रहे हैं, जिसकी मदद से हम स्पेशल बच्चों में स्कूलिंग की आदतों को डेवेलप कर सकें। हमारा प्रयास यह भी कि ‘द होप रिहैबिलिटेशन एंड लर्निंग सेंटर’ के साथ-साथ जितने भी ऐसे सेंटर्स लखनऊ में संचालित हो रहे हैं,
उनको सरकार मॉनिटर करे। स्पेशल बच्चों के पेरेंट्स को कागजी कार्यवाही के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। उनकी दौड़ कम हो सके, इसके लिए हम लगातार प्रयासरत हैं। हमारी कोशिश है कि अच्छे सेंटर्स पर यूआईडी के सरकारी कैंप लगाये जाएं, जिससे एक ही छत के नीचे स्पेशल बच्चों के सभी कागजी कार्य संपन्न हो सकें।



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