रणजी ट्रॉफी के 91 साल के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। इस बार खिताब जीतने वाली टीम कोई और नहीं बल्कि जम्मू-कश्मीर क्रिकेट टीम है, जिसने वर्षों के संघर्ष, धैर्य और मेहनत के बाद भारतीय घरेलू क्रिकेट में इतिहास रच दिया। यह जीत सिर्फ एक ट्रॉफी जीतने भर का विषय नहीं, बल्कि विश्वास, सुधार और सही नेतृत्व की जीत है।

शुरुआती संघर्ष और धीमी प्रगति: जम्मू-कश्मीर ने 1959-60 सत्र में रणजी ट्रॉफी में पहली बार भाग लिया। शुरुआती वर्षों में टीम को किसी भी बड़ी उपलब्धि के लिए तैयार नहीं माना जाता था। 334 मुकाबलों में केवल 45 जीत दर्ज करना इसका प्रमाण था। टीम की पहली जीत 1982-83 में सेना के खिलाफ मिली। यह जीत उस दौर के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ थी, जिसने टीम के भीतर उम्मीद की किरण जगाई।
90 के दशक में कई बड़ी टीमों के लिए जम्मू-कश्मीर के खिलाफ मुकाबला आसान समझा जाता था। दिल्ली के कुछ पूर्व खिलाड़ियों के संस्मरणों में यह बात साफ झलकती है कि उस समय जम्मू-कश्मीर के खिलाफ खेलना रन बनाने का सुनहरा अवसर माना जाता था। दिग्गज बल्लेबाजों और अनुभवी खिलाड़ियों के सामने टीम के युवा खिलाड़ी अक्सर दबाव में रहते थे।
लेकिन समय के साथ सोच बदली, मानसिकता बदली और टीम ने अपने भीतर सुधार की शुरुआत की।
आत्मविश्वास और बड़ी उपलब्धियां: जम्मू-कश्मीर टीम के लिए पहली बड़ी सफलता 2013-14 में आई, जब उसने नेट रन रेट के आधार पर गोवा को पीछे छोड़ते हुए क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया। यह उपलब्धि टीम के आत्मविश्वास को नई दिशा देने वाली साबित हुई।
इसके बाद 2015-16 सत्र में कप्तान परवेज़ रसूल की अगुवाई में टीम ने वानखेड़े स्टेडियम में मुंबई को हराकर सनसनी फैला दी। यह जीत जम्मू-कश्मीर के क्रिकेट इतिहास की सबसे यादगार जीतों में से एक मानी जाती है। इन सफलताओं ने खिलाड़ियों को विश्वास दिलाया कि वे सिर्फ भाग लेने के लिए नहीं, बल्कि जीतने के लिए भी मैदान में उतर सकते हैं।
दिल्ली का योगदान और संरचनात्मक सुधार: जम्मू-कश्मीर क्रिकेट के उत्थान में दिल्ली क्रिकेट जगत का योगदान अहम रहा। टीम के साथ जुड़ने वाले पूर्व भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी ने खिलाड़ियों में प्रतिस्पर्धा और अनुशासन की भावना विकसित की। उन्होंने स्पष्ट किया कि मैदान पर उतरने का उद्देश्य केवल हिस्सा लेना नहीं, बल्कि जीत हासिल करना है।
इसके बाद संजय शर्मा जैसे पूर्व खिलाड़ी कोचिंग के जरिए टीम को दिशा देते रहे। लेकिन असली बदलाव तब आया जब जम्मू के मूल निवासी मिथुन मन्हास को जम्मू-कश्मीर क्रिकेट संघ की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने प्रशासनिक सुधारों और पेशेवर माहौल के जरिए टीम में स्थिरता और अनुशासन स्थापित किया।
मन्हास का सबसे अहम निर्णय था अजय शर्मा को मुख्य कोच नियुक्त करना। अजय शर्मा ने कप्तान पारस डोगरा के साथ मिलकर टीम में आक्रामकता, आत्मविश्वास और जीतने की मानसिकता डाली। दिल्ली की प्रतिस्पर्धी मानसिकता और अनुशासन को जम्मू-कश्मीर की नई पीढ़ी ने आत्मसात किया।
ऐतिहासिक फाइनल और खिताबी जीत: रणजी ट्रॉफी के फाइनल में जम्मू-कश्मीर का मुकाबला कर्नाटक क्रिकेट टीम से हुआ। पहला पारी खेलते हुए जम्मू-कश्मीर ने 291 रन की बड़ी बढ़त हासिल की, जिससे मैच में पकड़ मजबूत हो गई। पांचवें दिन दूसरी पारी में चार विकेट पर 342 रन बनाने के बाद कुल बढ़त 633 रन तक पहुंच गई।
कप्तान पारस डोगरा ने पारी घोषित की और मैच ड्रॉ पर समाप्त हुआ। लेकिन पहली पारी की बढ़त के आधार पर जम्मू-कश्मीर ने पहली बार रणजी ट्रॉफी का खिताब अपने नाम कर लिया। यह जीत न केवल टीम के लिए, बल्कि पूरे जम्मू-कश्मीर के लिए गर्व और प्रेरणा का क्षण साबित हुई।
संघर्ष से शिखर तक, एक नई पहचान: जम्मू-कश्मीर की यह उपलब्धि केवल खेल की जीत नहीं है। यह दशकों के संघर्ष, सुधार और सही मार्गदर्शन का प्रतीक है। जिस टीम को कभी कमजोर माना जाता था और जिसके खिलाफ खेल को आसान समझा जाता था, वही टीम अब भारतीय घरेलू क्रिकेट की शीर्ष टीम के रूप में उभरी है।
इस जीत ने जम्मू-कश्मीर के खिलाड़ियों में आत्मविश्वास और आक्रामकता की नई भावना भर दी है। अब यह टीम न केवल भाग लेने के लिए, बल्कि जीतने और इतिहास रचने के लिए मैदान में उतरती है।
भविष्य की राह और प्रेरणा: जम्मू-कश्मीर का यह सफर युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बन गया है। यह कहानी साबित करती है कि सही मार्गदर्शन, अनुशासन और आत्मविश्वास के साथ किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है।
राज्य सरकार ने विजेता टीम के लिए ईनाम की राशि का एलान किया है, जो खिलाड़ियों के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन है। लेकिन असली पुरस्कार वह विश्वास और नई पहचान है, जो टीम ने भारतीय क्रिकेट में अर्जित की है।
जम्मू-कश्मीर की यह जीत यह संदेश देती है कि लंबे समय तक संघर्ष करने के बाद भी मेहनत, धैर्य और सही रणनीति से किसी भी शिखर को छूना संभव है।
जम्मू-कश्मीर क्रिकेट टीम का यह सफर संघर्ष से शिखर तक का प्रतीक है। यह सिर्फ रणजी ट्रॉफी जीतने का क्षण नहीं, बल्कि भारतीय घरेलू क्रिकेट में एक नई प्रेरणादायक कहानी है। जो टीम कभी कमजोर मानी जाती थी, आज वही टीम देश की सर्वश्रेष्ठ बनकर उभरी है।

